तेजा बाबा विशेष लेख
तेजाजी की सम्पूर्ण और प्रामाणिक कथा
वीर तेजाजी महाराज राजस्थान के सबसे पूजनीय लोक देवताओं में से एक हैं, जिन्हें शिव का 11वां अवतार और गायों व सर्पों के रक्षक के रूप में जाना जाता है. उनकी कथा सत्य, वचनबद्धता और वीरता की एक अद्भुत मिसाल है.
तेजाजी की सम्पूर्ण और प्रामाणिक कथा नीचे दी गई है:
जन्म और प्रारंभिक जीवनजन्म: वीर तेजाजी का जन्म राजस्थान के नागौर जिले के खड़नाल गाँव में वर्ष 1074 (माघ शुक्ल चतुर्दशी) को एक जाट परिवार में हुआ था.माता-पिता: उनके पिता का नाम ताहड़ जी और माता का नाम रामकुंवारी था.विवाह: बाल विवाह की प्रथा के कारण उनका विवाह बचपन में ही पेमल से हो गया था, लेकिन इस बात से तेजाजी अनजान थे.
भाभी का ताना और ससुराल यात्रा
एक बार तेजाजी अपने खेतों में हल चला रहे थे. दोपहर के समय उनकी भाभी खाना लेकर बहुत देरी से पहुँचीं. भूखे और थके हुए तेजाजी ने जब देरी का कारण पूछा, तो भाभी ने ताना मारते हुए कहा, "इतनी ही गरम-गरम और जल्दी रोटी खानी है, तो अपनी पत्नी को पीहर (ससुराल) से लिवा लाओ।" यह बात तेजाजी के दिल पर लग गई. उन्होंने तुरंत अपनी लीलण घोड़ी सजाई और अपनी पत्नी पेमल को लाने के लिए अपने ससुराल पनेर के लिए रवाना हो गए.
लाछां गुजरी की गायें और सर्प देवता को वचन
जब तेजाजी पनेर पहुँचे, तो उसी रात वहां मेर के मीणा चोरों ने पेमल की सहेली लाछां गुजरी की गायों को चुरा लिया. लाछां गुजरी ने रोते हुए तेजाजी से मदद मांगी. वीर तेजाजी ने गायों को बचाने का संकल्प लिया और अपनी घोड़ी पर सवार होकर डाकुओं के पीछे निकल पड़े.रास्ते में उन्होंने देखा कि एक भयानक आग में एक नाग जोड़ा जल रहा था. तेजाजी ने दया करके अपने भाले की नोक से नाग को आग से बाहर निकाल दिया. इस पर नाग (वासुक नाग) क्रोधित हो गया और बोला, "मैं तो मोक्ष प्राप्त कर रहा था, तुमने मुझे बचाकर मेरा मोक्ष छीन लिया. अब मैं तुम्हें डसूंगा।"तेजाजी ने विनम्रता से कहा, "हे नाग देवता! इस समय मैं एक संकट में फंसी बहन की गायों को छुड़ाने जा रहा हूँ। मैं आपको वचन देता हूँ कि गायों को मुक्त कराने के बाद मैं खुद आपके पास वापस आऊंगा, तब आप मुझे डस लेना।" तेजाजी के सत्य और वचनों पर विश्वास करके नाग ने उन्हें जाने दिया.
भयंकर युद्ध और घायल होना
तेजाजी ने डाकुओं को ललकारा और उनके बीच भयंकर युद्ध हुआ. उन्होंने वीरता से लड़ते हुए सभी गायों को छुड़ा लिया. लेकिन इस युद्ध में उनका पूरा शरीर गहरे घावों से छलनी हो गया था. शरीर का ऐसा कोई हिस्सा नहीं बचा था जहाँ से खून न बह रहा हो.
वचन पालन और वीरगति
गायों को सुरक्षित वापस लाने के बाद, मरणासन्न हालत में भी तेजाजी नाग देवता के पास अपना वचन निभाने पहुँचे. उन्हें देखकर नाग देवता ने कहा, "तेजा, तुम्हारे पूरे शरीर पर घाव हैं और खून बह रहा है, मैं तुम्हें कहाँ डसूँ?"
तब वीर तेजाजी ने मुस्कुराकर अपनी जीभ बाहर निकाली, क्योंकि केवल उनकी जीभ ही एक मात्र ऐसा स्थान था जहाँ कोई घाव नहीं था. नाग देवता ने उनकी वचनबद्धता से प्रसन्न होकर उनकी जीभ पर डस लिया.डसने से पहले नाग देवता ने उन्हें वरदान दिया, "आज के बाद जो भी व्यक्ति, चाहे वह इंसान हो या पशु, तुम्हारे नाम का तागा (धागा) बांधेगा, उस पर सांप के जहर का कोई असर नहीं होगा।"
भाद्रपद शुक्ल दशमी (तेजा दशमी) के दिन सुरसुरा (किशनगढ़) नामक स्थान पर तेजाजी महाराज ने अपने प्राण त्यागे. उनकी मृत्यु का समाचार उनकी वफादार घोड़ी लीलण ने उनके घर तक पहुँचाया.
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तेजाजी की सम्पूर्ण और प्रामाणिक कथा नीचे दी गई है:
जन्म और प्रारंभिक जीवनजन्म: वीर तेजाजी का जन्म राजस्थान के नागौर जिले के खड़नाल गाँव में वर्ष 1074 (माघ शुक्ल चतुर्दशी) को एक जाट परिवार में हुआ था.माता-पिता: उनके पिता का नाम ताहड़ जी और माता का नाम रामकुंवारी था.विवाह: बाल विवाह की प्रथा के कारण उनका विवाह बचपन में ही पेमल से हो गया था, लेकिन इस बात से तेजाजी अनजान थे.
भाभी का ताना और ससुराल यात्रा
एक बार तेजाजी अपने खेतों में हल चला रहे थे. दोपहर के समय उनकी भाभी खाना लेकर बहुत देरी से पहुँचीं. भूखे और थके हुए तेजाजी ने जब देरी का कारण पूछा, तो भाभी ने ताना मारते हुए कहा, "इतनी ही गरम-गरम और जल्दी रोटी खानी है, तो अपनी पत्नी को पीहर (ससुराल) से लिवा लाओ।" यह बात तेजाजी के दिल पर लग गई. उन्होंने तुरंत अपनी लीलण घोड़ी सजाई और अपनी पत्नी पेमल को लाने के लिए अपने ससुराल पनेर के लिए रवाना हो गए.
लाछां गुजरी की गायें और सर्प देवता को वचन
जब तेजाजी पनेर पहुँचे, तो उसी रात वहां मेर के मीणा चोरों ने पेमल की सहेली लाछां गुजरी की गायों को चुरा लिया. लाछां गुजरी ने रोते हुए तेजाजी से मदद मांगी. वीर तेजाजी ने गायों को बचाने का संकल्प लिया और अपनी घोड़ी पर सवार होकर डाकुओं के पीछे निकल पड़े.रास्ते में उन्होंने देखा कि एक भयानक आग में एक नाग जोड़ा जल रहा था. तेजाजी ने दया करके अपने भाले की नोक से नाग को आग से बाहर निकाल दिया. इस पर नाग (वासुक नाग) क्रोधित हो गया और बोला, "मैं तो मोक्ष प्राप्त कर रहा था, तुमने मुझे बचाकर मेरा मोक्ष छीन लिया. अब मैं तुम्हें डसूंगा।"तेजाजी ने विनम्रता से कहा, "हे नाग देवता! इस समय मैं एक संकट में फंसी बहन की गायों को छुड़ाने जा रहा हूँ। मैं आपको वचन देता हूँ कि गायों को मुक्त कराने के बाद मैं खुद आपके पास वापस आऊंगा, तब आप मुझे डस लेना।" तेजाजी के सत्य और वचनों पर विश्वास करके नाग ने उन्हें जाने दिया.
भयंकर युद्ध और घायल होना
तेजाजी ने डाकुओं को ललकारा और उनके बीच भयंकर युद्ध हुआ. उन्होंने वीरता से लड़ते हुए सभी गायों को छुड़ा लिया. लेकिन इस युद्ध में उनका पूरा शरीर गहरे घावों से छलनी हो गया था. शरीर का ऐसा कोई हिस्सा नहीं बचा था जहाँ से खून न बह रहा हो.
वचन पालन और वीरगति
गायों को सुरक्षित वापस लाने के बाद, मरणासन्न हालत में भी तेजाजी नाग देवता के पास अपना वचन निभाने पहुँचे. उन्हें देखकर नाग देवता ने कहा, "तेजा, तुम्हारे पूरे शरीर पर घाव हैं और खून बह रहा है, मैं तुम्हें कहाँ डसूँ?"
तब वीर तेजाजी ने मुस्कुराकर अपनी जीभ बाहर निकाली, क्योंकि केवल उनकी जीभ ही एक मात्र ऐसा स्थान था जहाँ कोई घाव नहीं था. नाग देवता ने उनकी वचनबद्धता से प्रसन्न होकर उनकी जीभ पर डस लिया.डसने से पहले नाग देवता ने उन्हें वरदान दिया, "आज के बाद जो भी व्यक्ति, चाहे वह इंसान हो या पशु, तुम्हारे नाम का तागा (धागा) बांधेगा, उस पर सांप के जहर का कोई असर नहीं होगा।"
भाद्रपद शुक्ल दशमी (तेजा दशमी) के दिन सुरसुरा (किशनगढ़) नामक स्थान पर तेजाजी महाराज ने अपने प्राण त्यागे. उनकी मृत्यु का समाचार उनकी वफादार घोड़ी लीलण ने उनके घर तक पहुँचाया.